Sankshipta Sundarakanda - A Telugu Poem

By Padmashri Elchuri Vijayraghavrao


A Brief narration of
Valmiki Sundarakanda
by
Pandit Elchri Vijayraghavrao



पुनरागमनमु

नभोवीधि नलुगडलनु
नाट्यमाडु मेघमु वलॆ
पर्वताग्रमुनु बोलिन
पवन सुतुडु गर्जिंचुचु
सीतल दृममय
“महेंद्र शिखरमु” पै
दिगिवच्चॆनु!

वानरुलंदरू अपुडु
वायु सुतुनिगनि, भक्तिग
चेतुल जोडिंचि निलिचि
चेमोड्पुल नर्पिंचिरि.....


जरिगिन वृत्तांत मंत
ऎऱुग दलचि संतसमुग
जांबवंतुडु हनुमनु
जानकिनि गुरिंचि प्रश्निंचॆ

“सीत नॆट्लु कनुगॊंटिवि?
स्तिमितमुगा नुंडॆ गदा...
क्रूरुडु रावणुडामॆनु
कुत्सितमुग बाधिंचॆना?”

पुण्य जानकिनि गुरिंचि
पुलकितमनुडैन मारुति,
बयलुदेरिनदि मॊदलुग,
भद्रमुगा समुद्रमुनु
लंघिंचिन घडिय नुंडि
लंका दहनमु वरकू
सुवृत्तांत सर्वस्वमु
सविस्तृतमुग वर्णिंचि
जांबवंतुनितो निट्लनॆ

“श्रीरामुडु, सुग्रीवुडु
सीता विमुक्तिकि चेसॆडु
जतनमुलिक सफलमगुनु......

रतनमु वलॆ शीलमुगल
सती साध्वि जानकिपै
भगवत्कृप वलन नाकु
भक्ति समन्वित मैनदि....


स्वत: तानु बहु कृशांगि.....
पति वियोग दुःखमुतो
पटुतरमुग कृशिंचिनदि!
प्राप्तिंचिन दुःखमुनकु
प्रतीकार विधि गनवलॆ....”

वालि पुत्रुडु अंगदुडप्पुडु
वायुसुतुनिकि वाक्रुच्चॆ निटुल

“राक्षस सहितमुगा लंकापुरि
रंपियतो खंडिंचि वेतुनु...
राक्षस राजगु रावणासुरुनि
रयमुग वधिंतु नेनॊक्कडने...

मिगता वीरुलू, मीरू तलपडि
मिन्नु मन्नु नेकमु जेयवलयु...
सीतादेविनि गॊनिपोकुंडा
श्रीरामुनि कडकेगुटनुचितमु;
योधुलैन वानर वीरुल कदि
योग्यमु गादनि नाकु तोचिनदि”

ई माटलु विनि संतोषमुगा
निट्लनॆ जांबवंतु डातनितो

“अंगदा!
नी आलोचनलत्युत्तममैनवनि
ग्रहिंचिति!
रणवीरुल गल वानर सैन्यमु
राक्षसुलनु जयिंचि तीरगलदु
कानी!

रामुनि आज्ञा पालन
गाविंचुटये मनकर्तव्यमु....
कावुन रामुनि यानति गैकॊनि
कार्य सिद्धि ऎट्लगुनो चूतमु...”

जांबवंतुनि पलुकुलु
जाग्रमुगा विनि योधुलु
हितमुग अट्ले चेयुट
किच्चगिंचि संतुष्टुलै
महेंद्र पर्वतमुनु विडिचि
मरलि पोव समकट्टिरि....

आकस मार्गमुनंदु बोवुतरि
अति सुंदर लत, सुम, दृममुलु गल
इंद्रुनि नंदन वनमुनु बोलिन
इंपैन 'मधुवनमु' नु
गांचिरट!

ए प्राणिकिनी तेऱि चूचुटकु
ऎन्नडुनू साध्यमुगा दक्कड!
वासिग मनोज्ञमैन आ वनमु
वानरेंद्रुडगु सुग्रीवुनिदि....

अंगदाज्ञगॊनि अंदरु वनमुन
आनंदमुतो नोललाडुचू
कोरिन रीतिनि प्रेरणनु बॊंदि
कॊंदरु नृत्यमु चेय दॊडंगिरि!
कॊंदरु फलमूलादुलनु तॆंचि
कॊंटॆग वनमुनु ध्वंसमु जेसिरि!

मधुवन रक्षकुडैन 'दधिमुखुडु'
मदटग चॆलरेगिन वानरुलनु
वारिंचिननू धिक्करिंचुचू
वानिनि हिंसिंचि वनमु दोचिरि!

मधुपान भ्रष्टुडैन अंगदुडु
मैकमुतो तन पिता महुडैन
दधिमुखुनि गुर्तिंचने लेक
पृधिविपै नॆट्टि बाधिंच दॊडगॆ!

दैवमनस्कुडू वयोवृद्धुडगु
दधिमुखुडट नुंडि तप्पिंचुकुनि
एकांत प्रवेशमुनकु जेर्मॊनि
ऎदुटि सेवकुलतो तानिट्लनॆ

“अंगदादुलनु अट्लुंड निंडु;
वंद्युडु, मन प्रभुवु, घनुडैन
वानरेंद्रुडगु सुग्रीवु डिपुडु
वासु देवुडैन रामुनिकड गलडु;
पोयि सुग्रीवुनिकि दॆलुपुदुमु;
पॊलुवनु तगिन रीति शिक्षिंचुनु”

दधिमुखुडपुडु वन पालकुलतो
दारुन आकसमुन नॆगुरुचू
क्षण कालमुलो राघवुडु, मरियु
सुग्रीवुडुन्न स्थलमुनकु जेरॆनु...

मधुवन रक्षकुल नायकुडैन
दधिमुखुडंदरु भृत्युल नडुमन
सुडिबडु ऎदतो शिरमु नॊग्गुचू
सुग्रीवुनि पादमुलपै वालॆनु!

साष्टांग नमस्कारमु जेसिन
साधुवानरुनि जूचि कलततो
“दधिमुखुडा! ना पादमुपैबडि
दंडमुलुडिगिति वॆंदुलकु?
लॆम्मु....
अभयमु निच्चिति....
नीमनसु नॊच्चु अहितमेमि जरिगॆनु?
विनगोरॆद....”

अट्लु महात्मुडु सुग्रीवुडु तन
कभयमु नॊसगग, दधिमुखुडिट्लनॆ
“राजा! मी तंड्रि गारु 
ऋक्षरजुनि कालमुननो,
वंद्युडु, राजेंद्रुडैन
वालि कालमुननो, लेक
इपुडो, अपुडो, ऎपुडू
चॊर शक्यमुगानि
दिव्य तरमगु मधु वनमु निपुडु
अंगदादि कपि मूकलु
अति ध्वंसमु जेसि तुदकु
मद्यमु सेविंचि, मम्मु
मैकमुतो पीडिंचिरि!”

अदिविनि सुग्रीवुडनॆनु
“कार्य विजय फल प्राप्तिनि
गनिन हर्षपातमंदु
फलमुलु तिनि
तेनॆ तागि
बलमुग क्रीडारतुलै
वांछ दीर वर्तिंचि रेमो!

क्रियावंतुलै नंदुन
प्रियमुग
ने क्षमिंचितिनि....
मरल नीवु मुनुपटि वलॆ
मधु वनमुनु कापाडुमु...
वायु सुतुनि सहितमुग
वानर घनुलनु
पंपु मिटकु....”

संतुष्टुडैन दधिमुखुडु
संतसिंचि विनयमुतो
राम लक्ष्मण सुग्रीवुल
नाम मॆंचि नमस्करिंचॆ....

आ तदुपरि तिरिगि वच्चि रयमुग
अंगदादुलनु, गलिसि दधिमुखुडु
अंदऱि क्षेममॆऱिंगि, सौम्यमुग
“वंद्युडु मी पिनतंड्रि महिमगल
वानरेंद्रुडगु सुग्रीवुडु, मिमु
शीघ्रमुगा नच्चटिकि पंपमनि
चॆप्पॆनु नातो
वॆळ्ळ गोरॆद” ननॆ....

अंत, वानरुल 'किल किल' शब्धमु
लाकाशमुलो प्रति ध्वनिंचॆनु!
रामुनि दर्शनकुतूहलमुतो
वानरु लॊच्चिन हर्षध्वनि, अदि!
अंगदुडिनि, हनुमनु मुंदिडुकॊनि
ऎंदरॆंदरो विच्चेसिरटकु!

रणवीरुडु, कपिवर्युडु हनुमडु
रामुनि कड शिरसॊग्गि प्रणमिल्लि
पातिव्रत्य निर्णयमुतो नुन्न
पावनि जानकि क्षेममु दॆलिपॆनु...

सीता देविनि दर्शिंचिन विधि
श्रीरामुनि कड वर्णन जेयुचु
“आमॆनु रावण अंत: पुरमुन
अतिक्रूरमुगा निर्भंधिंचिरि;
ऒंटि जड धरिंचि दीनुरालै
ऒंटमिगा असुरलु चुट्टु मुट्टि
अनवरतमु मी ध्यान मग्नयै
अति वियोग दुःखमुनु जॆंदिनदि”

अट्लु चॆप्पि रामुनिकि पवनसुतु
डंदजेसॆ अनुपम चूडामणि!
दैतुनकै पंपिन चूडामणि
दशरध राज सुपुत्रुडु गैकॊनि
तलमुनकलुगा तन ऎद चलिंचि
तनुवु कन्नीटि सागर मायॆनु!

सिक्तनयनमुलतो मुद्रिक गनि
सीता देविनि जूचिनट्लायॆ!!

“अंजन सुतुडा! मऱि मऱि दॆलुपुमु
अमॆ वाक्कु नाकमृतवर्निणि...
दाहार्तुनिकै जल तृप्ति बोलॆ
तनिवि तीर विनि
शमनमगुनु ऎद....”

महात्मुडगु रामचंद्रुनिकि मारुति
सीता वाक्कुलनु प्रीतिग जॆप्पॆनु
“कोमल हृदयुडु रामुनिकि नापै
कॊंचॆमैन अभिमानमुन्नचो
धनुर्धारियै शीघ्रमेतॆंचि
दशाननुनि दंडिंचि, खंडिंचि
रणमुन घनविजयमॊंदवलॆननि
रामा! जानकि निन्नु कोरिनदि...

कन्नुल नीरु निंपुकॊनि नातो
करुण वाक्यमुलु परिपरि बलुकग
वैदेहिनि गनि
नेनिट्लंटिनि

'परम पावनी! सीता देवी!
परमात्मुडु रामुडु युद्धमुलो
दुष्ट रावणुनि बंधु सहितमुग
तुत्तुनियलु जेसि अयोध्यकु
तुरितमु निनुगॊनिपोवुट
तथ्यमु..

शतृ मर्दनमु गाविंचिगने
शौर्यपराक्रमुडैन राघवुडु
वन वासमु नुंडि तरलि
नीतो वैभवमुग पट्टाभिषिक्तुडगुनु!'

अदि विनि वियोग संतप्तयैन
आमॆ कनुलु अशृभरित मायॆनु!
मरल प्रीतिगल माटलु जॆप्पिति;
मात सीत कुपशमनमु गल्गॆनु..."

***
सुंदरकांड समाप्तमु

***
श्रीरामा! जयमु! जयमु!
सीतारामा जै! जै!

***

“पवन तनय संकटहरण
मंगळ मूरति रूप!
राम लक्ष्मण सीता सहित
हृदय बसहु
सुरभूपा!”
शुभमस्तु!

***

समाप्तं...



अपदामपहर्तारं दातारं सर्व संपदाम्।
लोकाभि रामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यह॥।
***
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||om tat sat||

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